— श्रीमद्भगवद्गीता के ५ विषय – –


ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल तथा कर्म इन सबकी व्याख्या भगवद्गीता में हुई है। इन पाँचों में से ईश्वर, जीव, प्रकृति तथा काल शाश्वत हैं। प्रकृति की अभिव्यक्ति अस्थायी हो सकती है, परन्तु यह मिथ्या नहीं है। कोई-कोई दार्शनिक कहते हैं कि प्रकृति की अभिव्यक्ति मिथ्या है लेकिन भगवद्गीता या वैष्णवों के दर्शन के अनुसार ऐसा नहीं है। जगत की अभिव्यक्ति को मिथ्या नहीं माना जाता। इसे वास्तविक, किन्तु अस्थायी माना जाता है। यह उस बादल के सदृश है जो आकाश में घूमता रहता है, या वर्षा ऋतु के आगमन के समान है, जो अन्न का पोषण करती है। ज्योंही वर्षा ऋतु समाप्त होती है और बादल चले जाते हैं, त्योंही वर्षा द्वारा पोषित सारी फसल सूख जाती है। इसी प्रकार यह भौतिक अभिव्यक्ति एक निश्चित अन्तराल में होती है, कुछ काल तक ठहरती है और फिर लुप्त हो जाती है। प्रकृति इस रूप में कार्यशील है। लेकिन यह चक्र निरन्तर चलता रहता है। इसीलिए प्रकृति शाश्वत है, मिथ्या नहीं है। भगवान् इसे मेरी प्रकृति कहते हैं। यह भौतिक प्रकृति (अपरा प्रकृति) परमेश्वर की भिन्ना-शक्ति है। इसी प्रकार जीव भी परमेश्वर की शक्ति हैं, किन्तु वे विलग नहीं, अपितु भगवान् से नित्य-सम्बद्ध हैं। इस तरह भगवान्, जीव, प्रकृति तथा काल, ये सब परस्पर सम्बन्धित हैं और सभी शाश्वत हैं। लेकिन दूसरी वस्तु कर्म शाश्वत नहीं है। हाँ, कर्म के प्रभाव अत्यन्त पुरातन हो सकते हैं। हम अनादि काल से अपने शुभअशुभ कर्मफलों को भोग रहे हैं, किन्तु साथ ही हम अपने कर्मों के फल को बदल भी सकते हैं और यह परिवर्तन हमारे ज्ञान की पूर्णता पर निर्भर करता है। हम विविध प्रकार के कर्मों में व्यस्त रहते हैं। निस्संदेह हम यह नहीं जानते कि किस प्रकार के कर्म करने से हम कर्मफल से राहत प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन भगवद्गीता में इसका भी वर्णन हुआ है। ईश्वर अर्थात् परम ईश्वर की स्थिती परम चेतना-स्वरूप है। जीव भी ईश्वर के अंश होने के कारण चेतन है। जीव तथा भौतिक प्रकृति दोनों को प्रकृति बताया गया है अर्थात् वे परमेश्वर की शक्ति हैं, किन्तु इन दोनों में से केवल जीव चेतन है, दूसरी प्रकृति चेतन नहीं है। यही अन्तर है। इसीलिए जीव प्रकृति परा या उत्कृष्ट कहलाती है, क्योंकि जीव, भगवान् जैसी चेतना से युक्त है।
लेकिन भगवान् की चेतना परम है, और किसी को यह नहीं कहना चाहिए कि जीव भी परम चेतन है। जीव कभी भी, यहाँ तक कि अपनी सिद्ध अवस्था में भी, परम चेतन नहीं हो सकता और यह सिद्धान्त भ्रामक है कि जीव परम चेतन हो सकता है। वह चेतन तो हो सकता है, लेकिन
पूर्ण या परम चेतन नहीं।

जीव तथा ईश्वर का अन्तर भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय में बताया जायेगा। ईश्वर क्षेत्रज्ञ व चेतन है, जैसाकि जीव भी है, लेकिन जीव केवल अपने शरीर के प्रति सचेत रहता है, जबकि भगवान् समस्त शरीरों के प्रति सचेत रहते हैं। चूँकि वे प्रत्येक जीव के हृदय में वास करते हैं, अतएव वे जीवविशेष की मानसिक गतिशीलता से परिचित रहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए।
यह भी बताया गया है कि परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में ईश्वर या नियन्ता के रूप में वास कर रहे हैं और जैसा जीव चाहता है वैसा करने के लिए जीव को निर्देशित करते रहते हैं। जीव भूल जाता है कि उसे क्या करना है। पहले तो वह किसी एक विधि से कर्म करने का संकल्प करता है, लेकिन फिर वह अपने ही कर्म की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं में उलझ जाता है। एक प्रकार का शरीर त्यागने के बाद वह दूसरा शरीर ग्रहण करता है जिस प्रकार हम वस्त्र उतारते तथा पहनते रहते हैं। इस प्रकार जब आत्मा देहान्तरण कर जाता है, उसे अपने विगत (पूर्वकृत्) कर्मों का फल भोगना पड़ता है। ये कार्यकलाप तभी बदल सकते हैं जब जीव सतोगुण में स्थित हो और यह समझे कि उसे कौन से कर्म करने चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तो उसके विगत (पूर्वकृत्) कर्मों के सारे फल बदल जाते हैं। फलस्वरूप कर्म शाश्वत नहीं हैं। इसीलिए हमने यह कहा है कि पाँचों (ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल तथा कर्म) में से चार शाश्वत हैं, कर्म शाश्वत नहीं है। परम चेतन ईश्वर जीव से इस प्रकार में समान है—भगवान् तथा जीव दोनों की चेतनाएँ दिव्य
हैं। यह चेतना पदार्थ के संयोग से उत्पन्न नहीं होती है। ऐसा सोचना भ्रान्तिमूलक है। भगवद्गीता इस सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करती कि चेतना विशेष परिस्थितियों में पदार्थ के संयोग से उत्पन्न होती है। यह चेतना भौतिक परिस्थितियों के आवरण के कारण विकृत रूप से प्रतिबिम्बित हो सकती है जिस प्रकार रंगीन काँच से परावर्तित प्रकाश उसी रंग का प्रतीत होता है परन्तु भगवान् की चेतना पदार्थ से प्रभावित नहीं होती है। किन्तु भगवान् की चेतना भौतिकता से प्रभावित नहीं होती है। भगवान् कहते हैं—मयाध्यक्षेण प्रकृति:। जब वे इस भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं तो उनकी चेतना पर भौतिक प्रभाव नहीं पड़ता। यदि वे इस तरह प्रभावित होते तो दिव्य विषयों के सम्बन्ध में उस तरह बोलने के अधिकारी न होते जैसाकि भगवद्गीता में बोलते हैं। भौतिक कल्मष-ग्रस्त चेतना से मुक्त हुए बिना कोई दिव्य-जगत के विषय में कुछ नहीं कह सकता। अत:
भगवान् भौतिक दृष्टि से कलुषित (दूषित) नहीं हैं। परन्तु हमारी चेतना अभी भौतिक कल्मष से दूषित है। भगवद्गीता शिक्षा देती है कि हमें इस कलुषित चेतना को शुद्ध करना है। शुद्ध चेतना होने पर हमारे सारे कर्म ईश्वर की इच्छानुसार होंगे और इससे हम सुखी हो सकेंगे। ऐसा नहीं कि हमें अपने सारे कार्य बन्द कर देने चाहिए। अपितु, हमें अपने कर्मों को शुद्ध करना चाहिए और परिष्कृत कर्म भक्ति कहलाते हैं। भक्ति में कर्म सामान्य कर्म प्रतीत होते हैं, किन्तु वे कलुषित नहीं होते। एक अज्ञानी व्यक्ति भक्त को सामान्य व्यक्ति की भाँति कर्म करते देख सकता है, किन्तु ऐसा मूर्ख यह नहीं समझता कि भक्त या भगवान् के कर्म अशुद्ध चेतना या पदार्थ से कलुषित नहीं होते। वे त्रिगुणातीत होते हैं। जो भी हो, हमें यह जान लेना चाहिए कि अभी हमारी चेतना कलुषित है।

– भूमिका, श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप, श्रील प्रभुपाद

श्रीश्री राधागोपीनाथ भगवान की जय ।।

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