— सेवा जीव (जीवात्मा) की चिर सहचरी है —


अग्रेजी का रिलीजन शब्द सनातन-धर्म से थोड़ा भिन्न है। रिलीजन से विश्वास का भाव सूचित होता है, और विश्वास परिवर्तित हो सकता है। किसी को एक विशेष विधि में विश्वास हो सकता है और वह इस विश्वास को बदल कर दूसरा अपना सकता है, लेकिन सनातन-धर्म उस कर्म का सूचक है जो बदला नहीं जा सकता। उदाहरणार्थ, न तो जल से उसकी तरलता विलग की जा सकती है, न अग्नि से उष्मा विलग की जा सकती है, ठीक इसी प्रकार जीव से उसके नित्य कर्म को विलग नहीं किया जा सकता। सनातन-धर्म जीव का शाश्वत अंग है। अतएव जब हम सनातन-धर्म के विषय में बात करते हैं तो हमें श्रीपाद रामानुजाचार्य के प्रमाण को मानना चाहिए कि उसका न तो आदि है न अन्त। जिसका आदि व अन्त न हो वह साम्प्रदायिक नहीं हो सकता क्योंकि उसे किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। जिनका सम्बन्ध किसी सम्प्रदाय से होगा वे सनातन-धर्म को भी साम्प्रदायिक मानने की भूल करेंगे, किन्तु यदि हम इस विषय पर गम्भीरता से
विचार करें और आधुनिक विज्ञान के प्रकाश में सोचें तो हम सहज ही देख सकते है कि सनातन-धर्म विश्व के समस्त लोगों का ही नहीं अपितु ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों का है। भले ही असनातन धार्मिक विश्वास का मानव इतिहास के पृष्ठों में कोई आदि हो, लेकिन
सनातन-धर्म के इतिहास का कोई आदि नहीं होता, क्योंकि यह जीवों के साथ शाश्वत रहता है। जहाँ तक जीवों का सम्बन्ध है, प्रामाणिक शास्त्रों का कथन है कि जीव का न तो जन्म होता है, न मृत्यु। गीता में कहा गया है कि जीव न तो कभी जन्मता है, न कभी मरता है। वह शाश्वत तथा अविनाशी है, और इस क्षणभंगुर शरीर के नष्ट होने के बाद भी रहता है। सनातन-धर्म के स्वरूप के प्रसंग में हमें धर्म की धारणा को संस्कृत के मूल शब्द के अर्थ से समझना होगा। धर्म का अर्थ है जो पदार्थ विशेष में सदैव रहता है। हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अग्नि के साथ उष्मा तथा प्रकाश सदैव रहते हैं, उष्मा व प्रकाश के बिना अग्नि शब्द का कोई अर्थ नहीं होता। इसी प्रकार
हमें जीव के उस अनिवार्य अंग को ढूँढना चाहिए जो उसका चिर सहचर है। यह चिर सहचर उसका शाश्वत गुण है और यह शाश्वत गुण ही उसका नित्य धर्म है।

जब सनातन गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रत्येक जीव के स्वरूप के विषय में जिज्ञासा की तो भगवान् ने उत्तर दिया कि जीव का स्वरूप या स्वाभाविक स्थिति भगवान् की सेवा करना है। यदि हम चैतन्य महाप्रभु के इस कथन का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि एक जीव दूसरे जीव की सेवा में निरन्तर लगा हुआ है। एक जीव दूसरे जीव की सेवा कई रूपों में करता है। ऐसा करके, जीव जीवन का भोग करता है। निम्न पशु मनुष्यों की सेवा करते हैं जैसे सेवक अपवे स्वामी की सेवा करते हैं। एक व्यक्ति (अ) अपने स्वामी (ब) की सेवा करता है, (ब) अपने स्वामी (स) की, (स) अपने स्वामी (द) की और इसी तरह। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक मित्र दूसरे मित्र की सेवा करता है, माता पुत्र की सेवा करती है, पत्नी पति की सेवा करती है, पति पत्नी की सेवा करता है। यदि हम इसी भावना से खोज करते चलें तो पाएँगे कि समाज में ऐसा एक भी अपवाद नहीं है जिसमें कोई जीव सेवा में न लगा हो। एक राजनेता जनता के समक्ष अपना घोषणा-पत्र प्रस्तुत करता है ताकि उनको उसकी सेवा करने की क्षमता के विषय में विश्वास दिला सके। फलत: मतदाता उसे यह सोचते हुए अपना बहुमूल्य मत देते हैं कि वह समाज की महत्त्वपूर्ण सेवा करेगा। दुकानदार अपने ग्राहक की सेवा करता है और कारीगर (शिल्पी) पूँजीपतियों की सेवा करते हैं। पूँजीपति अपने परिवार की सेवा करता है और परिवार शाश्वत जीव की शाश्वत सेवा क्षमता से राज्य की सेवा करता है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि कोई भी जीव अन्य जीव की सेवा करने से मुक्त नहीं है। अतएव हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सेवा जीव की चिर सहचरी है और सेवा करना जीव का शाश्वत (सनातन) धर्म है।

तथापि मनुष्य काल तथा परिस्थिति विशेष के प्रसंग में एक विशिष्ट प्रकार की श्रद्धा को अंगीकार करता है, और इस प्रकार वह अपने को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध या किसी अन्य सम्प्रदाय का मानने वाला बताता है। ये सभी उपाधियाँ सनातन-धर्म नहीं हैं। एक हिन्दू अपनी श्रद्धा बदल कर मुसलमान बन सकता है, या एक मुसलमान अपनी श्रद्धा बदल कर हिन्दू बन सकता है या कोई ईसाई अपनी श्रद्धा बदल सकता है, इत्यादि। किन्तु इन सभी परिस्थितियों में धार्मिक श्रद्धा में परिवर्तन होने से अन्यों की सेवा करने का शाश्वत-धर्म (वृत्ति) प्रभावित नहीं होता। हिन्दू, मुसलमान या ईसाई समस्त परिस्थितियों में किसी न किसी के सेवक हैं। अतएव किसी विशेष श्रद्धा को अंगीकार करना अपने सनातन-धर्म को अंगीकार करना नहीं है। सेवा करना ही सनातन-धर्म है। वस्तुत: भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध सेवा का सम्बन्ध है। परमेश्वर परम भोक्ता हैं और हम सारे जीव उनके सेवक हैं। हम सब उनके भोग (सुख) के लिए उत्पन्न किये गये हैं और यदि हम भगवान् के साथ उस नित्य भोग में भाग लेते हैं, तो हम सुखी बनते हैं। हम किसी अन्य प्रकार से सुखी नहीं हो सकते। स्वतन्त्र रूप से सुखी बन पाना सम्भव नहीं है, जिस प्रकार शरीर का कोई भी भाग उदर से सहयोग किये बिना सुखी नहीं रह सकता। परमेश्वर की दिव्य प्रेममय सेवा किये बिना जीव सुखी नहीं हो सकता।

– भूमिका, भगवद्गीता, श्रील प्रभुपाद

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