— भगवान् श्रीकृष्ण अद्वय हैं —


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श्रीमद्भागवत १०.७४.४ तात्पर्य:

श्रील प्रभुपाद अपनी पुस्तक “श्रीकृष्ण” में लिखते हैं ‘‘[राजा युधिष्ठिर ने कहा] आपकी वास्तविक स्थिति सदैव उच्चस्थ है, ठीक सूर्य के समान, जो अपने उदय और अस्त होते समय एक ही तापमान पर बना रहता है। यद्यपि उदय होते और अस्तमान सूर्य के बीच तापमान में हम अन्तर अनुभव करते हैं तथापि सूर्य का तापमान कभी बदलता नहीं। आप सदैव दिव्यरूप से सम अवस्था में रहते हैं, अत: आप भौतिक कार्यकलापों की किसी भी परिस्थिति से प्रसन्न अथवा बेचैन नहीं होते। आप परब्रह्म, भगवान् हैं और आपके लिए कोई सपिेक्षता नहीं होती हैं।’’
श्रील श्रीधर स्वामी भी वैदिक मंत्रों में से ऐसा ही कथन उद्धृत करते हैं न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् (शतपथ ब्राह्मण १.७.२.२८, तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१२.९.७ तथा बृहदारण्यक उपनिषद्..२३)—वे अपने कर्मों से न तो बढ़ते हैं, न ही घटते हैं। जैसाकि यहाँ पर राजा युधिष्ठिर ने बतलाया है, भगवान् अद्वय हैं। उनकी समानता करने वाला कोई अन्य जीव नहीं है और यह तो उनकी अहैतुकी कृपा ही है कि वे महाराज युधिष्ठिर जैसे अपने शुद्ध भक्त के आदेशों को मानने के लिए तैयार
हो जाते हैं। जब वे अपने शरणागत भक्तों पर अपनी अहैतुकी कृपा प्रदर्शित करते हैं, तो निश्चित ही इससे भगवान् के पद में कोई कमी नहीं आती।


श्रीकृष्ण गीतामे कहते हे :

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥ ४.९॥

अनुवाद: हे अर्जुन! जो मेरे आविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे सनातन धाम को प्राप्त होता है।

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ ४.१४॥

अनुवाद: मुझ पर किसी कर्म का प्रभाव नहीं पड़ता, न ही मैं कर्मफल की कामना करता हूँ। जो मेरे सम्बन्ध में इस सत्य को जानता है, वह भी कर्मों के फल के पाश में नहीं बँधता।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को संबोधित कर कहते हे:

अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ॥ १०.१२॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥ १०.१३॥

अर्जुन ने कहा—आप परम भगवान्, परमधाम, परमपवित्र, परमसत्य हैं। आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं। नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं।

सन्दर्भ :

  1. Bhagavad-Gita as it is
  2. Srimad Bhagavatam complete 12 cantos in Hindi

हरे कृष्ण 

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