— श्रीकृष्ण के दिव्य ६४ गुण —


चैतन्य चरितामृत मध्य लीला, अध्याय २३ में वर्णित श्रीकृष्णके दिव्य/अप्राकृतिक ६४ गुण –

 श्री चैतन्य महाप्रभु, सनातन गोस्वामी से कहते हे – “श्रीकृष्ण में अनंत गुण हे । उनमे ६४ गुण प्रमुख हे । भक्तोंके कर्ण संतुष्ट हो जाते हे इन गुणोंको एक के बाद एक सुनने से । वे गुण हे –

(१) अति मनोहर अङ्ग (२) सर्व सुलक्षणोंसे युक्त, (३) सुन्दर, (४) महातेज़स्वी, (५) बलवान (६) किशोर वयसयुक्त, (७) विविध अदभुत भाषापटु (८) सत्यवादी, (९) मदुभाषी, (१०) वाक्पटु, (११) बुद्धिमान, (१२) सुंपण्डित, (१३) प्रतिभाशाली, (१४) विदग्ध अथवा रसिक, (१५) चतुर, (१६) निपुण, (१७) कृतज्ञ, (१८) सुदृढ़ व्रत, (१९) देश–काल–पात्रको पूर्णरूपसे जाननेवाले, (२०) शास्त्र-दृष्टि सम्पन्न, (२१) पवित्र, (२२) जितेन्द्रिय, (२३) स्थिर, (२४) संयमी, (२५) क्षमाशील, (२६) गम्भीर, (२७) धीर, (२८) सम, (२९) वदान्य, (३०) धार्मिक, (३१) शूर, (३२) करुण, (३३) दूसरोंको मान देनेवाले, (३४) दक्षिण अर्थात् अनुकूल, (३५) विनयी, ३६) लज्जायुक्त, (३७) शरणागतपालक (३८) सुखी, (३९) भक्त–सुर्हद, (४०) प्रेमाधीन, (४१) कल्याणकारी, (४२) प्रतापी, (४३) कीर्तिशाली, (४४) सर्व-प्रिय, (४५) सज्जन पुरुषोंका पक्ष ग्रहण करनेवाले, (४६) नारी मनोहारी, (४७) सबके आराध्य, (४८) समृद्धिशाली, (४९) श्रेष्ट, (५०) ईश्वर अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त । ये ५० गुण भगवान् श्रीकृष्णमें समुद्रकी तरह अगाध और असीम रूपमें वर्तमान हैं , तथा जीवोन्मे ये बिन्दु-बिन्दू रूपमें हैं। श्रीकृष्णके अन्य ५ गुण जो ब्रह्मा शिवादि देवताओँमें आंशिक रूपमे वर्तमान हैं, वे ये हैं– (५१) सदा स्वरूपमें स्थिति, (५२) सर्वज्ञ, (५३) नित्य-नवीन, (५४) सच्चिदानन्द घनीभूत-स्वरूप, (५५) सर्व-सिद्धियोंसे सेवित । ये ५५ गुण देवताओंके बून्द-बून्द रूपमें होते हैं ।

श्रीनारायणमें इन ५५ गुणोंके अतिरिक्त और भी ५ गुण अधिक हैं: ५६) अचिन्त्यशक्तिशाली, (५७) कोटि ब्रह्माण्ड विग्रहत्व, (५८) अवतारोंके बीज या कारण, (५९) हतारिगतिदायक और (६०) आत्माराम – जीवोंको भी आकर्षण करनेवाले। – ये पाँच गुण श्रीब्रह्मा और श्रीशिवादिमें नहीं होते, परन्तु श्रीकृष्णमें अत्यन्त अद्भुत भावसे पूर्णतमरूपमें विद्यमान होते हैं।

इन ६० गुणोंके अतिरिक्त श्रीकृष्णमें ४ गुण और भी अधिक होते हैं जो श्रीकृष्णके अतिरिक्त श्रीनारायणरूप आदि किसीमें भी नहीं पाये जाते :
(६१) सर्वाधिक चमत्कारपूर्ण लीलामाधुरी, (६२) प्रेम माधुरी, (६३) रूप माधुरी और, (६४) वेणु माधुरी।

// जिन्हें श्रीकृष्ण तत्त्व यथार्थ नहीं पता वो पूछ सकते हे की क्या ये वर्णन अवतार भेद नहीं दिखाता? उत्तर : यह  वर्णन किसी भी तरह से अवतारोंमे भेद नहीं दर्शाता, परंतु लिलाभेद पर आधारित है जो की द्रष्टव्य हे एवं स्वयं भगवान के अवतार श्रीकृष्ण चैतन्य द्वारा वर्णित है ।

हरे कृष्ण 

Advertisements

One Comment Add yours

  1. sailen mudi says:

    no speach will fully explain our Krishna but this information make another picture of Krishna . Jaya Nitai

    Like

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s