गौर पूर्णिमा: जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए ।


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Sri Chaitanya Mahaprabhu

— जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए । —

 श्रीमद्भगवतम् ११.५.३२

कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् ।
यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥ ३२॥

 शब्दार्थ
कृष्ण-वर्णम्—कृष्ण में आये अक्षरों को दुहराना; त्विषा—कान्ति से; अकृष्णम्—काला नहीं (सुनहला); स-अङ्ग—संगियों समेत; उप-अङ्ग–सेवकगण; अस्त्र—हथियार; पार्षदम्—विश्वासपात्र साथी; यज्ञै:—यज्ञ द्वारा; सङ्कीर्तन-प्रायै:—मुख्य रूप से सामूहिक कीर्तन से युक्त; यजन्ति—पूजा करते हैं; हि—निश्चय ही; सु-मेधस:—बुद्धिमान व्यक्ति।

अनुवाद :

कलियुग में, बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर के उस अवतार की पूजा करने के लिए सामूहिक कीर्तन (संकीर्तन) करते हैं, जो निरन्तर कृष्ण के नाम का गायन करता है। यद्यपि उसका वर्ण श्यामल (कृष्ण) नहीं है किन्तु वह साक्षात् कृष्ण है। वह अपने संगियों, सेवकों, आयुधों तथा विश्वासपात्र साथियों की संगत में रहता है।

 तात्पर्य : यही श्लोक चैतन्य-चरितामृत (आदि लीला ३.५२) में कृष्णदास कविराज द्वारा उद्धृत किया गया है। श्रील प्रभुपाद ने इस श्लोक की टीका इस प्रकार की है—‘‘यह पाठ श्रीमद्भागवत (११.५.३२) में आया है। श्रील जीव गोस्वामी ने भागवत पर की गई अपनी टीका क्रम सन्दर्भ में इस श्लोक की व्याख्या की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भगवान् कृष्ण सुनहरे रंग में भी प्रकट होते हैं। ये सुनहरे भगवान् कृष्ण, भगवान् चैतन्य हैं, जिनकी पूजा इस युग में बुद्धिमान लोग करते हैं। इसकी पुष्टि श्रीमद्भागवत में गर्ग मुनि द्वारा की गई है, जिन्होंने कहा था कि यद्यपि बालक कृष्ण श्यामल है, किन्तु वह तीन अन्य रंगों में–लाल, श्वेत तथा पीले रंग में भी प्रकट होता है। उन्होंने अपने श्वेत तथा लाल वर्णों का प्रदर्शन क्रमश: सत्ययुग तथा त्रेतायुग में किया। किन्तु उन्होंने पीले-सुनहरे रंग का प्रदर्शन तब तक नहीं किया, जब तक वह भगवान् चैतन्य के रूप में प्रकट नहीं हुए, जो गौर हरि के नाम से विख्यात हैं।

श्रील जीव गोस्वामी बतलाते हैं कि कृष्णवर्णम् का अर्थ है, श्रीकृष्ण चैतन्य। कृष्णवर्णम् तथा कृष्णचैतन्य समतुल्य है।कृष्ण-नाम भगवान् कृष्ण तथा भगवान् चैतन्य कृष्ण दोनों में आता है। श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् हैं, किन्तु वे कृष्ण का वर्णन करने में सदैव लगे रहते हैं और इस तरह वे उनके नाम तथा रूप का कीर्तन करके तथा स्मरण करके दिव्य आनन्द पाते हैं। स्वयं भगवान् कृष्ण सर्वोच्च उपदेश देने के लिए चैतन्य के रूप में प्रकट होते हैं। वर्णयति का अर्थ है ‘‘कहता है’’ या ‘‘वर्णन करता है।’’ भगवान् चैतन्य सदैव कृष्ण-नाम का कीर्तन करते हैं और उसका गुणानुवाद भी करते हैं और चूँकि वे स्वयं कृष्ण हैं, अतएव जो भी उनसे मिलता है, वह स्वत: कृष्ण-नाम का कीर्तन करता है और बाद में अन्यों से उसका कथन करता है। वह दूसरे व्यक्ति में दिव्य कृष्णभावनामृत प्रविष्ट कर देता है, जिससे कीर्तन करने वाला दिव्य आनन्द में लीन हो जाता है। इसलिए वह सभी तरह से हर एक के समक्ष कृष्ण-रूप में प्रकट होता है चाहे व्यक्ति-रूप में हो या ध्वनि के रूप में। श्री चैतन्य का दर्शन करने से ही, उसे तुरन्त भगवान् कृष्ण का स्मरण हो आता है। इस तरह उन्हें विष्णु तत्त्व के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, श्री चैतन्य साक्षात् भगवान् कृष्ण हैं।

सांगोपांगास्त्र-पार्षदम् भी यह सूचित करता है कि श्री चैतन्य भगवान् कृष्ण हैं। उनका शरीर सदैव चन्दन के आभूषणों तथा चन्दन-लेप से विभूषित रहता है। अपने अद्वितीय सौन्दर्य से वे अपने युग के सारे लोगों को दमित करते हैं। अन्य अवतारों में कभी कभी भगवान् ने अस्त्रों का उपयोग असुरों को परास्त करने के लिए किया था, किन्तु इस युग में भगवान् चैतन्य महाप्रभु जैसे सर्व आकर्षक रूप से उन असुरों का दमन करते हैं। श्रील जीव गोस्वामी व्याख्या करते हैं कि उनका सौन्दर्य असुरों को दमन करने के लिए उनके अस्त्र हैं। चूँकि वे सर्व आकर्षक हैं, अतएव यह समझना होगा कि सारे देवता उनके संगियों जैसे रहते थे। उनके कर्म असाधारण थे और उनके संगी अद्भुत थे। जब उन्होंने संकीर्तन आन्दोलन का प्रसार किया, तब विशेषकर बंगाल तथा बिहार में अनेक विद्वानों तथा आचार्यों को आकृष्ट किया। श्री चैतन्य के साथ सदा ही उनके श्रेष्ठतम संगी, जैसे कि नित्यानन्द, अद्वैत, गदाधर तथा श्रीवास रहते थे। ‘‘श्रील जीव गोस्वामी ने वैदिक साहित्य का एक श्लोक उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि यज्ञ-प्रदर्शनों या उत्सवों को मनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे टीका करते हैं कि ऐसे बाहरी दिखलावटी प्रदर्शनों में न लगकर सारे लोगों को जाति तथा रंग का भेदभाव त्यागकर भगवान् चैतन्य की पूजा करने के लिए हरे कृष्ण महामंत्र का सामूहिक कीर्तन करना चाहिए। कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णम् यह सूचित करता है कि कृष्ण-नाम को वरीयता प्रदान की जानी चाहिए। श्री चैतन्य ने कृष्णभावनामृत की शिक्षा दी और कृष्ण-नाम का कीर्तन किया। इसलिए श्री चैतन्य की पूजा करने के लिए सभी लोगों को मिल कर महामंत्र का—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे/हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे का कीर्तन करना चाहिए। गिरजाघरों, मन्दिरों या मसजिदों में पूजा का प्रसार करना सम्भव नहीं रहा, क्योंकि लोगों को इसमें रुचि नहीं है। किन्तु हरे कृष्ण का कीर्तन कहीं भी किया जा सकता है। इस तरह से श्री चैतन्य की पूजा करते हुए सर्वोच्च कर्म किया जा सकता है और भगवान् को तुष्ट करने का सर्वोच्च धार्मिक उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।

‘‘श्री चैतन्य महाप्रभु के सुप्रसिद्ध शिष्य श्रील सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा है, ‘‘जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए हैं। वे इतने दयालु हैं कि कृष्ण-प्रेम का वितरण कर रहे हैं। हर व्यक्ति को चाहिए कि उनके चरणकमलों की ओर अधिकाधिक आकृष्ट हो, जिस तरह कि गुनगुनाते भौंरे कमल-पुष्प की ओर आकृष्ट होते हैं।’’

श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार का वर्णन श्रीविष्णुसहस्रनाम में भी हुआ है, जो महाभारत के दानधर्म पर्व के अध्याय १८९ में आया है। श्रील जीव गोस्वामी ने इसका सन्दर्भ इस प्रकार दिया है—
सुवर्णवर्णो हेमांगो वरांगश्चन्दनांगदी–अपनी प्रारम्भिक लीलाओं में वे सुनहले रंग वाले गृहस्थ के रूप में प्रकट होते हैं। उनके अंग सुन्दर हैं और उनका चंदन-लेपित शरीर पिघले सोने जैसा लगता है।
उन्होंने यह भी उद्धृत किया है–संन्यासकृच्छम: शान्तो निष्ठा शान्ति परायण:—बाद की लीलाओं में वे संन्यास धारण करते हैं और समभाव तथा शान्त रहते हैं। वे शान्ति तथा भक्ति के सर्वोच्च धाम हैं, क्योंकि वे निर्विशेषवादी अभक्तों को चुप करा देते हैं।

श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य भेद अभेद सिद्धांत:

भगवान् अपनी आंशिक अभिव्यक्ति द्वारा परमात्मा के रूप में नौ इंच से अधिक माप के नहीं होते। वे अपनी योगमाया से विराट रूप में विस्तार करते हैं, जिसमें चराचर जीवों की विभिन्न किस्मों के रूप में व्यक्त जैविक तथा अजैविक सारी वस्तुएँ आ जाती हैं। अतएव ब्रह्माण्ड की व्यक्त किस्में भगवान् से भिन्न नहीं होतीं, जिस प्रकार विभिन्न रूप-रंग के सुनहले आभूषण स्वर्ण की मूल राशि से भिन्न नहीं होते। दूसरे शब्दों में, भगवान् वह परम पुरुष है, जो सृष्टि के भीतर प्रत्येक वस्तु पर नियन्त्रण रखता है और फिर भी वह समस्त व्यक्त भौतिक सृष्टि से भिन्न पृथक् परम सत्ता बना रहता है।इसीलिए भगवद्गीता (९.४-५) में उन्हें योगेश्वर कहा गया है। प्रत्येक वस्तु भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति पर निर्भर है, फिर भी वे ऐसे रूपों से पृथक् और परे रहते हैं। ऋग मन्त्र के वैदिक पुरुष-सूक्त में भी इसकी पुष्टि हुई है। एक ही साथ एकात्म तथा वैभिन्य के इस दार्शनिक सत्य का प्रतिपादन भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने किया था और यह अचिन्त्य भेदाभेद तत्त्व कहलाता है। ब्रह्मा, नारद तथा अन्य सभी एक ही समय भगवान् के साथ एक तथा उनसे पृथक् हैं। हम सभी उनके साथ उसी तरह हैं जिस तरह सोने के आभूषण गुण में स्वर्णराशि के समान हैं, लेकिन सोने का कोई भी एक आभूषण मात्रा में स्वर्ण-राशि के तुल्य नहीं होता। यह स्वर्ण-राशि कभी समाप्त नहीं होती, चाहे उससे असंख्य आभूषण क्यों न बनाये जाँय, क्योंकि यह राशि पूर्णम् है; यदि पूर्णम् में से पूर्णम् निकाल लिया जाय तो भी परम पूर्णम्, पूर्णम् ही बना रहता है। यह तथ्य हमारी वर्तमान अपूर्ण इन्द्रियों द्वारा अचिन्त्य है। इसीलिए भगवान् चैतन्य अपने दार्शनिक सिद्धान्त को अचिन्त्य कहते हैं और जैसाकि भगवद्गीता तथा भागवत से भी पुष्टि होती है, भगवान् चैतन्य का अचिन्त्य भेदाभेद तत्त्व परम सत्य विषयक पूर्ण दर्शन है।

— श्रीमद्भागत पुराण २.६.१३.-१६ तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

इस कलिकाल में श्रीभगवान् लीलावतार के रूप में, लीलाओं के प्रदर्शनार्थ प्रकट नहीं होते:

श्रीमद्भागतम् ५/१८/३५:

ॐ नमो भगवते मन्त्रतत्त्वलिङ्गाय यज्ञक्रतवे महाध्वरावयवाय महापुरुषाय नम: कर्मशुक्लाय त्रियुगाय नमस्ते. ॥ ३५॥

हे प्रभो, हम विराट पुरुष के रूप में आपको सादर नमस्कार करते हैं। केवल मंत्रोच्चार से हम आपको पूर्णत: समझ सकते हैं। आप यज्ञरूप हैं, आप क्रतु हैं। अत: यज्ञ के सभी अनुष्ठान आपके दिव्य शरीर के अंशरूप हैं और केवल आप ही समस्त यज्ञों के भोक्ता हैं। आपका स्वरूप दिव्य गुणों से युक्त है। आप ‘त्रियुग ’ कहलाते हैं, क्योंकि कलियुग में आप प्रच्छन्न अवतार लेते है और आप छहों ऋद्धियों के स्वामी हैं।

तात्पर्य : श्री चैतन्य महाप्रभु इस कलियुग के लिए अवतार हैं, जैसाकि पुराणों, महाभारत,
श्रीमद्भागवत तथा अन्य उपनिषदों में अनेक स्थलों में पुष्टि हुई है। उनके आविर्भाव का विवरण चैतन्यचरितामृत (मध्यलीला ६.९९) में निम्न प्रकार मिलता है—

कलियुगे लीलावतार ना करे भगवान्।
अतएव ‘त्रियुग’ करि’ कहि तार नाम॥

इस कलिकाल में श्रीभगवान् लीलावतार के रूप में, लीलाओं के प्रदर्शनार्थ प्रकट नहीं होते। इसलिए वे त्रियुग कहलाते हैं। अन्य अवतारों के विपरीत श्री चैतन्य महाप्रभु कलिकाल में श्रीभगवान् के भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। इसीलिए उन्हें छन्नावतार कहा जाता है।

शिक्षाष्टकं

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने संस्कृत में आठ श्लोकों की रचना की जिन्हें शिक्षाष्टक कहा जाता है । यह शिक्षाष्टक हर वैष्णव के लिए अति महत्वपूर्ण हे ।
श्री चैतन्य शिक्षाष्टक
चेतोदर्पणमार्जनं भव-महादावाग्नि-निर्वापणम्
श्रेयः-कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू-जीवनम् ।
आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम्,
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण-संकीर्तनम् ॥१॥

अर्थात – चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस,सभी को पवित्र करने वाले श्रीकृष्ण कीर्तन की उच्चतम विजय हो.
नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥

अर्थात – हे प्रभु, आपने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, जिनका किसी समय भी स्मरण किया जा सकता है. हे भगवन्, आपकी इतनी कृपा है परन्तु मेरा इतना दुर्भाग्य है कि मुझे उन नामों से प्रेम ही नहीं है.
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥३॥

अर्थात – स्वयं को तृण से भी छोटा समझते हुए, वृक्ष जैसे सहिष्णु रहते हुए, कोई अभिमान न करते हुए और दूसरों का सम्मान करते हुए सदा श्रीहरि का भजन करना चाहिए.
न धनं न जनं न सुन्दरीं
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे
भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥

अर्थात – हे जगत के ईश्वर! मैं धन, अनुयायी, स्त्रियों या कविता की इच्छा न रखूँ। हे प्रभु, मुझे जन्म जन्मान्तर में आपसे ही अकारण प्रेम हो.
अयि नन्दतनुज किंकरं
पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।
कृपया तव पादपंकज-
स्थितधूलिसदृशं विचिन्तय॥५॥

अर्थात – हे नन्द के पुत्र, इस दुर्गम भव-सागर में पड़े हुए मुझ सेवक को अपने चरण कमलों में स्थित धूलि कण के समान समझ कर कृपा कीजिये.
नयनं गलदश्रुधारया वदनं गदगदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥६॥

अर्थात – हे प्रभु, कब आपका नाम लेने पर मेरी आँखों के आंसुओं से मेरा चेहरा भर जायेगा, कब मेरी वाणी हर्ष से अवरुद्ध हो जाएगी, कब मेरे शरीर के रोम खड़े हो जायेंगे.
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् ।
शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द विरहेण मे॥७॥

अर्थात – श्रीकृष्ण के विरह में मेरे लिए एक क्षण एक युग के समान है, आँखों में जैसे वर्षा ऋतु आई हुई है और यह विश्व एक शून्य के समान है.
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-
मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो
मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥८॥

अर्थात – उनके चरणों में प्रीति रखने वाले मुझ सेवक का वह आलिंगन करें या न करें, मुझे अपने दर्शन दें या न दें, मुझे अपना मानें या न मानें, वह चंचल, नटखट श्रीकृष्ण ही मेरे प्राणों के स्वामी हैं, कोई दूसरा नही.
श्री श्री राधागोपीनाथ भगवान की जय !!

उपदेश

श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने सबसे अधिक जोर श्री कृष्ण के नामोंका संकीर्तन करने पर दिया हे जो की कलियुग में एकमात्र मुक्तिका साधन हे. उन्होंने इस विषय में यह संस्कृत श्लोक उदृत किया हे:

हरेर नाम हरेर नाम हरेर नामैव केवलम कलौ नास्ति एव नास्ति एव नास्ति एव गतिर अन्यथा ||

“झगड़ा और पाखंड के इस युग में उद्धार का एकमात्र साधन प्रभु के पवित्र नाम का जाप है! और कोई रास्ता नहीं। और कोई रास्ता नहीं। और कोई रास्ता नहीं!”

जय निताई गौरांग !!

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