श्रीपाद शंकराचार्य द्वारा घोषित करना की भवसागर से पार होनेका एकमात्र उपाय श्रीहरिनाम हे!


हमारे सभी पाठकोंको श्रीपाद शंकराचार्यजीकी जयंती की हार्दिक शुभकामनाए

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श्रीपाद द्वारा घोषित करना की भवसागर से पार होनेका एकमात्र उपाय हरिनाम हे!

श्रीपाद द्वारा घोषित करना की भवसागर से पार होनेका एकमात्र उपाय हरिनाम हे!

जैसा की श्रीमद्भागवत,विष्णु,पद्म आदि पुराणोंमे एवं कलिसंतरण उपनिषदमें स्पष्ट हे की कलियुग का धर्म केवल श्रीहरि के नाम ही हे, इसका समर्थन श्रीपाद शंकराचार्य,श्रीपाद रामानुजाचार्य,श्रीपाद मध्वाचार्य,श्रीपाद श्रीधर स्वामी,श्रीपाद निम्बार्काचार्य आदि सहित स्वयं भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी किया हे तथा इनके पश्चात् गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी किया हे ।

यद्यपि शंकरजी के अवतार आदि शंकराचार्यजीने श्रीभगवान की आज्ञासे वेदोंका अप्रत्यक्ष अर्थ प्रकट कर मायावाद का प्रचार किया किन्तु वे पूर्ण निर्दोष हे । आदि शंकराचार्य के शिव अवतार होनेका और वेदोंके अप्रत्यक्ष अर्थ का प्रचार करने का अवतार उद्देश्य का वर्णन हमें पद्म,शिव,कूर्म आदि पुराणोंमे प्राप्त होता हे तथा इसका उल्लेख स्वयं चैतन्य महाप्रभु भी करते हे । उनके आने के पूर्व अधिकतर लोग बौद्धमत/शून्यवाद के कारन वेदोंके विरुद्ध हो गए थे एवं शून्यवाद को ही स्वीकार किया जा रहा था । इसीलिए श्रीहरि की आज्ञासे उन्होंने देश,काल और पात्र के अनुकूल ही अद्वैत दर्शन का प्रचार कर शून्यवाद का पूर्ण खंडन कर वेदोंको पुनः महत्ता प्रदान की । इस कारन स्वयं भगवान चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें ‘आचार्य’ कह संबोधित किया हे एवं उन्हें पूर्ण ‘निर्दोष’ घोषित किया हे । शंकराचार्य के इस जगत से अवतार कार्य समाप्त कर जाने के पश्चात् उनके अद्वैत मत का पूर्ण खंडन रामानुजाचार्य,मध्वाचार्य,निम्बार्काचार्य,श्रीधर स्वामी आदि अनेक विख्यात अध्यात्मवादीयोंसमेत स्वयं श्रीभगवान चैतन्य महाप्रभु ने भी किया हे । जिस प्रकार श्रीकृष्ण के अवतार बुद्ध भगवान का कार्य भी तात्कालिक था उसी प्रकार उनका अवतार कार्य भी तात्कालिक था जिससे ही बौद्धमत का खंडन हो सका था एवं वेदोंका पुनः प्रचार होने लगा । इस कारन समस्त वैष्णव गन उनका गुणगान करते हे और शून्यवाद का खंडन,वेदोंको पुनः महत्ता प्रदान करना और श्रीकृष्ण का गुणगान करने हेतु जिन ग्रंथोंकी रचना श्रीपाद शंकराचार्यजी ने की इन सब कारणोंसे समस्त हरिभक्त उनका गुणगान करते हे एवं अपनेको उनका ऋणी समझते हे.

भगवान शिवजी अपने इस अवतार शंकराचार्य में यद्यपि ऊपरी रूप से मायावाद/अद्वैत मत के प्रचारक थे किन्तु फिर भी वे गुप्तरूपसे परम वैष्णव ही थे (वैष्णवानां यथा शम्भू ) ।
उन्होंने अपने गीता भाष्य में “नारायणः परो अव्यक्ताद्” एवं “एको देवो देवकीपुत्र एव” अर्थात श्रीकृष्ण भौतिक जगत से परे हे एवं देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण ही एकमात्र श्रीभगवान हे यह स्वीकार किया हे । किन्तु आदि शंकराचार्यजी के अनुयायी उनके इन शब्दोंपर ध्यान नहीं देते ।
तथा अपनी रचना भज गोविन्दम् (३३) में शंकराचार्यजी ने स्पष्ट घोषित किया हे की कलियुग में केवल गोविन्द के नाम और उनका स्मरण ही भवसागर से पार होनेका मार्ग हे,अन्य कोई मार्ग नहीं ।


भज गोविन्दम् ३३ –

भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते।
नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥ (३३)
भावार्थ : हे मोह से ग्रसित बुद्धि वालो! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम का जाप और भगवान के स्मरण करने के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार होने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। (३३)

इस प्रकार आदि शंकराचार्यजी ने कृष्णभक्ति को सर्वोच्च एवं एकमात्र मार्ग स्वीकार किया हे ।

श्रीपाद आदि शंकराचार्यजी की जय !!

हरे कृष्ण हरे कृष्ण,
कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम,
राम राम हरे हरे ।।

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