षड-दर्शन: छ: परंपरागत वैदिक दर्शनों में से केवल बादरायण व्यास कृत वेदान्त ही त्रुटिरहित है।

परम्परागत भारतीय दर्शन में वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग तथा मीमांसा दर्शनों के अनुयायी अपने-अपने भ्रान्तिमूलक विचार रखते हैं, जिसकी ओर साक्षात् वेद इस स्तुति में इंगित कर रहे हैं। वैशेषिकजन कहते हैं कि इस दृश्य ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति परमाणुओं की मूलराशि से हुई (जनिम् असत:)।

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केन उपनिषद् (२.१): यदि तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभाँति जानते हो, तो तुम्हारा ज्ञान बहुत ही कम है।

  श्रीमद्भागवतं १०.८७.३० अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगतास् तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा । अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत् सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥ ३०॥ अनुवाद: यदि ये असंख्य जीव सर्वव्यापी होते और अपरिवर्तनशील शरीरों से युक्त होते, तो हे निर्विकल्प, आप संभवत: उनके परम शासक न हुए होते। लेकिन चूँकि वे आपके स्थानिक अंश हैं…

गौर पूर्णिमा: जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए ।

— जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए । —  श्रीमद्भगवतम् ११.५.३२ कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् । यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥ ३२॥  शब्दार्थ कृष्ण-वर्णम्—कृष्ण में आये अक्षरों को दुहराना; त्विषा—कान्ति से; अकृष्णम्—काला नहीं (सुनहला); स-अङ्ग—संगियों समेत; उप-अङ्ग–सेवकगण; अस्त्र—हथियार; पार्षदम्—विश्वासपात्र साथी; यज्ञै:—यज्ञ द्वारा; सङ्कीर्तन-प्रायै:—मुख्य रूप…

— श्रीकृष्ण के दिव्य ६४ गुण —

श्री चैतन्य महाप्रभु, सनातन गोस्वामी से कहते हे – “श्रीकृष्ण में अनंत गुण हे । उनमे ६४ गुण प्रमुख हे । भक्तोंके कर्ण संतुष्ट हो जाते हे इन गुणोंको एक के बाद एक सुनने से । वे गुण हे –
(१) अति मनोहर अङ्ग (२) सर्व सुलक्षणोंसे युक्त, (३) सुन्दर, (४) महातेज़स्वी, (५) बलवान (६) किशोर वयसयुक्त, (७) विविध अदभुत भाषापटु..

— भगवान् श्रीकृष्ण अद्वय हैं —

श्रीमद्भागवत १०.७४.४ तात्पर्य: श्रील प्रभुपाद अपनी पुस्तक “श्रीकृष्ण” में लिखते हैं ‘‘[राजा युधिष्ठिर ने कहा] आपकी वास्तविक स्थिति सदैव उच्चस्थ है, ठीक सूर्य के समान, जो अपने उदय और अस्त होते समय एक ही तापमान पर बना रहता है। यद्यपि उदय होते और अस्तमान सूर्य के बीच तापमान में हम अन्तर अनुभव करते हैं तथापि सूर्य का तापमान…

​– श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अद्भुत बाललीला —

 बालक निमाइ घुटनो और हाथोंके बल चलने लगे थे। उनके पिता श्रीजगन्नाथ मिश्र एवं माता श्रीशचीदेवी उनकी बालसुलभ क्रीड़ाओंको निहारकर फुले नहीं समाते। उस दिन शामको भारतके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए एक भक्त विप्र घरपर अतिथि रूपमे पधारे थे। मिश्रदम्पत्तिने श्रद्धापूर्वक लीप-पोतकर चौका लगाकर रसोइकी सामग्री उनके समक्ष प्रस्तुत की। विप्र महोदयनै स्वयं पाक कार्य…

— सेवा जीव (जीवात्मा) की चिर सहचरी है —

अग्रेजी का रिलीजन शब्द सनातन-धर्म से थोड़ा भिन्न है। रिलीजन से विश्वास का भाव सूचित होता है, और विश्वास परिवर्तित हो सकता है। किसी को एक विशेष विधि में विश्वास हो सकता है और वह इस विश्वास को बदल कर दूसरा अपना सकता है, लेकिन सनातन-धर्म उस कर्म का सूचक है जो बदला नहीं जा…

— सभी जीवोन्में श्रीकृष्ण को देखने का क्या अर्थ हे ? —

सभी जीवोन्में श्रीकृष्ण को देखने का क्या अर्थ हे ? क्या सभी को कृष्ण मान लिया जाय ? — असली ज्ञान होने से विनीत साधु, विद्वान तथा नम्र ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते तथा चण्डाल को समान दृष्टि से देखता है। — रन्तिदेव को हर जीव में भगवान् के दर्शन होते थे, किन्तु वह कभी यह…

— सुदर्शन चक्र भगवान् का नित्य अस्त्र हे —

सुदर्शन—यह सर्वाधिक शक्तिशाली अस्त्र है, यहाँ तक कि ब्रह्मास्त्र या अन्य विध्वंसक अस्त्रों से भी यह श्रेष्ठ है और इस चक्र को भगवान् ने (विष्णु या कृष्ण ने) अपने अस्त्र के रूप में स्वीकार किया था। किन्हीं-किन्हीं वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि अग्निदेव ने यह अस्त्र श्रीकृष्ण को प्रदान किया था, लेकिन सच्चाई…

— श्रीमद्भगवद्गीता के ५ विषय – –

ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल तथा कर्म इन सबकी व्याख्या भगवद्गीता में हुई है। इन पाँचों में से ईश्वर, जीव, प्रकृति तथा काल शाश्वत हैं। प्रकृति की अभिव्यक्ति अस्थायी हो सकती है, परन्तु यह मिथ्या नहीं है। कोई-कोई दार्शनिक कहते हैं कि प्रकृति की अभिव्यक्ति मिथ्या है लेकिन भगवद्गीता या वैष्णवों के दर्शन के अनुसार ऐसा…