केन उपनिषद् (२.१): यदि तुम सोचते हो कि तुम ब्रह्म को भलीभाँति जानते हो, तो तुम्हारा ज्ञान बहुत ही कम है।

  श्रीमद्भागवतं १०.८७.३० अपरिमिता ध्रुवास्तनुभृतो यदि सर्वगतास् तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा । अजनि च यन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत् सममनुजानतां यदमतं मतदुष्टतया ॥ ३०॥ अनुवाद: यदि ये असंख्य जीव सर्वव्यापी होते और अपरिवर्तनशील शरीरों से युक्त होते, तो हे निर्विकल्प, आप संभवत: उनके परम शासक न हुए होते। लेकिन चूँकि वे आपके स्थानिक अंश हैं…

गौर पूर्णिमा: जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए ।

— जब दिव्य भक्ति का सिद्धान्त लुप्त हो गया, तो श्रीकृष्ण चैतन्य भक्ति-विधि को पुन: बताने हेतु प्रकट हुए । —  श्रीमद्भगवतम् ११.५.३२ कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् । यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस: ॥ ३२॥  शब्दार्थ कृष्ण-वर्णम्—कृष्ण में आये अक्षरों को दुहराना; त्विषा—कान्ति से; अकृष्णम्—काला नहीं (सुनहला); स-अङ्ग—संगियों समेत; उप-अङ्ग–सेवकगण; अस्त्र—हथियार; पार्षदम्—विश्वासपात्र साथी; यज्ञै:—यज्ञ द्वारा; सङ्कीर्तन-प्रायै:—मुख्य रूप…

What does the Vedas say about its own origin?

OVERVIEW: ORIGIN OF THE VEDAS How the Vedas survived till the date or passed from one generation to another till the current age, i.e. Kaliyuga? When the Vedas first written down? ORIGIN OF THE VEDAS There are many, many different dates for the existence of the Vedas by the materialistic scholars or researchers, but what do…

God is both Personal and Impersonal

There are some sects (Smartism, Mayavadism (Advaitavadis) etc.) of people in the Sanatana Dharma who believe that the God is originally formless and quality-less only. But, the Logic and Vedic evidence say that the God is originally both, i.e. Formless and Not formless.

— श्रीकृष्ण के दिव्य ६४ गुण —

श्री चैतन्य महाप्रभु, सनातन गोस्वामी से कहते हे – “श्रीकृष्ण में अनंत गुण हे । उनमे ६४ गुण प्रमुख हे । भक्तोंके कर्ण संतुष्ट हो जाते हे इन गुणोंको एक के बाद एक सुनने से । वे गुण हे –
(१) अति मनोहर अङ्ग (२) सर्व सुलक्षणोंसे युक्त, (३) सुन्दर, (४) महातेज़स्वी, (५) बलवान (६) किशोर वयसयुक्त, (७) विविध अदभुत भाषापटु..

— भगवान् श्रीकृष्ण अद्वय हैं —

श्रीमद्भागवत १०.७४.४ तात्पर्य: श्रील प्रभुपाद अपनी पुस्तक “श्रीकृष्ण” में लिखते हैं ‘‘[राजा युधिष्ठिर ने कहा] आपकी वास्तविक स्थिति सदैव उच्चस्थ है, ठीक सूर्य के समान, जो अपने उदय और अस्त होते समय एक ही तापमान पर बना रहता है। यद्यपि उदय होते और अस्तमान सूर्य के बीच तापमान में हम अन्तर अनुभव करते हैं तथापि सूर्य का तापमान…

— Glories of Shri Krishna’s literary incarnation, i.e. Srimad Bhagavatam —

Glories of Srimad Bhagavatam from various Vedic texts: Overview: Characteristics and importance of Srimad Bhagavatam Srimad Bhagavatam is the essence of all the 5 Vedas Srimad Bhagavatam is literary incarnation of Supreme Personality of Godhead Sri Krishna Srimad Bhagavatam is a Maha-Purana When Lord Chaitanya Mahaprabhu defeated Mayavadi Acharya Prakashananda Sarswati (who later became a…

Two Kapilas and Real Samkhya darshana

Overview Atheistic Samkhya philosophy refuted in the Vedanta Sutra of Srila Vyasadeva. Purports by Srila Prabhupada. From the Govinda Bhashya (Vedanta sutra commentary) of Srila Baldeva Vidyabhushana Acharya: Adhikarana 1 The Sankhya Philosophy Refuted Introduction By Shrila Baladeva Vidyabhushana Vishaya—In the First Chapter was proved that the Supreme Personality of Godhead is faultless, is the master…

Lord Krishna and Rama in the Primary Vedas

The Primary Vedas Glorify Vishnu as Supreme Lord. However, The same Vedas mentions Krishna too. The Krishna Upanishada, Narayana Upanishada, Gopala Tapani Upanishada, Chandogya Upanishada and some other Upanishads mentions Lord Krishna.

​– श्रीचैतन्य महाप्रभुकी अद्भुत बाललीला —

 बालक निमाइ घुटनो और हाथोंके बल चलने लगे थे। उनके पिता श्रीजगन्नाथ मिश्र एवं माता श्रीशचीदेवी उनकी बालसुलभ क्रीड़ाओंको निहारकर फुले नहीं समाते। उस दिन शामको भारतके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए एक भक्त विप्र घरपर अतिथि रूपमे पधारे थे। मिश्रदम्पत्तिने श्रद्धापूर्वक लीप-पोतकर चौका लगाकर रसोइकी सामग्री उनके समक्ष प्रस्तुत की। विप्र महोदयनै स्वयं पाक कार्य…

Why should I feel proud of being a follower of Sanatana dharma?

There are many, many reasons. Some major reasons are as follows: You belong to the most tolerant path. You belong to the path which doesn’t spread hatred or convert anyone with the help of sword or any other means. It spreads and attract people naturally. You can accept any path of Sanatana Dharma namely, Vaishnavism,…